Monday, 30 September 2024

पानी की तरह बहो ✍️l

पता नहीं पुरुषार्थ से भाग्य की रेखाएं बनती है या रेखाओं से भाग्य बनता है जो भी है पहली बात पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए मेहनत के रास्ते हाथों में रेखाएं बनाते हुए निकलते हैं ---
 कभी पानी को रास्ता बनाते हुए देखिए, बिना शोर मचाए बिना किसी extra effort के शांति से रास्ता बना लेता है और साथ में कचरा भी बहा ले जाता है। पानी कभी किसी से कहता नहीं कि हटो- मेरा रास्ता छोड़ो।उसे अपने बूंदों की ताकत पर भरोसा है , सिर्फ जो मुझेआगे बढ़ाएंगी। कभी एक बार मां नर्मदा के उद्गम स्थान को देखिए एक पतली सी धारा अमरकंटक से शुरू होती है और चलते-चलते लगभग 1312 किलोमीटर तक विशाल रूप  लेती हुई रास्ते में मिलने वाले गांवों और शहरों को परिपोषित करती हुई  खंभात की खाड़ी तक जाती है। हाथों की रेखाओं के यह पतले पतले धागे जिनके ओर -छोर स्वतंत्र सिरो को लिए होते हैं यह एक संदेश देते हैं कि तुम्हें रेखाओं ने कभी बाधा नहीं डाली, तुम्हें इन रेखाओं ने बांधा नहीं है, तुम्हारी शक्तियां, तुम्हारी कार्य क्षमता, तुम्हारी सोच और तुम्हारी काबिलियत विस्तार को लिए हुए हैं ।
  चलिए रेखाओं 
 पर विश्वास भी कर लेते हैं कि इन रेखाओं के कारण मेरी तरक्की नहीं हो रही तो हर रेखा के अंत में एक गोल गड्ढा होना चाहिए था या उसके अंत में एक बड़ा क्रॉस बना होना चाहिए था जो यह बताता कि बस इससे आगे और, नहीं बढ़ा जा सकता पर ऐसा नहीं है, हर रेखा एक आजादी देती है, रास्ता देती है कि तुम आगे बढ़ो,पानी बनो और अपना रास्ता स्वयं बनाओ
 सुधा चौधरी(जैन )🙏
 धन्यवाद
कल फिर एक नए विचार के साथ🥰

Sunday, 29 September 2024

'जिजीविषा '

खुदकुशी के पल में लुट जाएगी दुनिया तेरी,सौ बार इस पर सोचो बदलेगी जिंदगी। तुम नहीं रहोगे किसी को फर्क ना पड़ेगा,  मां-बाप की तो सोचो, तड़पेगी जिंदगी।
 आत्महत्या की खबरें हमें कितना विचलित कर देती हैं। रोज सुनते हैं नंबर कम आने पर,exam में fail हो जाने पर, comptition  में select न होने पर या जीवन की समस्याओं से घबराकर किसी ने आत्महत्या कर ली! 
क्यों
लोग अपनी जान देने,  तैयार हो जाते हैं। क्या निराशा इतनी बड़ी हो जाती है कि आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती? उस समय यही सोचना होगा कि किसके जीवन में समस्या नहीं?यदि आत्महत्या समस्या का हल होता तो यह संसार लोगों से खाली हो चुका होता। सब के सब आत्महत्या से ही हल ढूंढ लेते लेकिन ऐसा होता नहीं सब जीवन से जूझते हैं, जूझना ही चाहिए क्योंकि जीवित रहेंगे तभी तो कुछ कर पाएंगे👍 मरकर तो कुछ हासिल नहीं होता 
एक छोटी सी चींटी तक संघर्षों से नहीं हारती. गाड़ी से कुचले हुए  पैर के साथ ,
 लंगड़ा हो जाने वाला कुत्ता भी सड़कों पर घूमता दिखाई दे जाता है।दुर्घटनाग्रस्त इंसान या जन्म से किसी गंभीर विकलांगता से पीड़ित लोग भी कितने ऊंचे पद और मुकाम पर पहुंच जाते हैं,यह सब को पता है। घबराकर जान देने की बातें वो करते हैं जिनका खुद पर से भरोसा उठ जाता है दुनिया में सबसे बड़ी कमजोरी है खुद पर से भरोसा उठ जाना इसी कमजोरी पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ना है।
 सुधा चौधरी (जैन) 
कल एक नए विचार के साथ 
 धन्यवाद🙏

Saturday, 28 September 2024

मुखौटा ✍️

जब हम मन में कुछ सोचते हैं लेकिन चेहरे के expression या भाव मन के विचारों को प्रकट नहीं होने देते कुछ और ही दिखाते हैं इसी का नाम मुखौटा है।वास्तव में यदि हम कुछ भी किसी के भी बारे में क्या सोच रहे हैं?अच्छा या बुरा उस भाव या विचार को चेहरे पर व्यक्त  नहीं होने देना यही तो मुखौटा है। मुखोटे अनेकों प्रकार के होते हैं जैसे, मां बच्चे को डांटते समय चेहरे को गुस्से से भर लेती है पर उसके अंतर में बच्चों के प्रति वात्सल्य ही रहता है,दूसरा हम किसी के प्रति बहुत अच्छे विचार नहीं रखते या उसे पसंद नहीं करते तब भी एक ऐसा face expression बना लेते हैं 'सुंदर,'की कोई मन के भावों को भांप नहीं सकता। लोक व्यवहार में यह ठीक हो सकता है किंतु आध्यात्म की दृष्टि से यह बिल्कुल ठीक नहीं, मित्रो रोज हम स्वयं का विश्लेषण करें तो रोजमर्रा के जीवन में मित्रों के सामने अलग,घर के नौकरों के सामनेअलग,रिश्तेदारों और परिवार जनों सामने अलग। यह अलग-अलग दिखाई देना, ही तो मुखोटे ओढ़ने जैसा है वास्तव में जैसे हम अंदर में है वैसे ही सरल और सहज बाहर में दिखे तभी हम इन मुखौटों से मुक्त हो सकते हैं। कभी-कभी इन मुखौटों को लगाए रखना जरूरी भी होता है,यदि मन के विचार शब्दों में और शब्दों का क्रियान्वयन शरीर से हो जाए तो यह संसार युद्ध का मैदान बन जाएगा। मन वचन और काय की एकरूपता का नाम ही मुखौटों से रहित जीवन है। 
सुधा चौधरी(जैन) 
कल फिर एक नए विचार के साथ धन्यवाद🙏✍️

Friday, 27 September 2024

उल्लास या उत्साह

उल्लास या उत्साह एक ऐसी भावना है जो आपको कभी थमने नहीं देती /थकने नहीं देती।किसी कार्य को शुरू करने की तीव्र इच्छा और उसके फल स्वरुप आने वाली मानसिक और शारीरिक सक्रियता। इसी को हम उत्साह कहते हैं। कार्य के समाप्त होने तक वही ऊर्जा बनी रहे इसी का नाम तो उत्साह है, जब इस प्रसन्नता में कोई भी प्रतिकूलता आए या किसी का भी असहयोग मिले, इन सब के बारे में जब हम रत्ती भर भी परेशान नहीं होते, कोई रुकावट--- रुकावट लगती ही नहीं या इस पर विजय प्राप्त करना आसान सा काम लगता है। हमारे अंदर का उत्साह कोई ना कोई हल निकल ही लेता है और हम लक्ष्य पर पहुंचकर ही दम लेते हैं।बच्चों से हम सही-सही अर्थों में उत्साह की परिभाषा सीख सकते हैं
 सुधा चौधरी( जैन )
कल फिर एक नए विचार के साथ आपके बीच,
🙏 धन्यवाद नमस्कार 

‘‘चुप रह गये’’

 ‘सर’ आप रिटायर हो रहे हैं। अब, आपकी काम करने की उम्र नहीं रही। बट नो टेंशन, सरकार बड़ी दयालु है आपको हर महीने पेंशन मिलती रहेगी।
 दस से पाँच तक की ड्यूटी, पांच से दस तक की ड्यूटी में बदल गई। पोते-पोतियों के संग खेलने की इच्छा बड़ी प्रबल थी, लेकिन जरा बच्चों को देखते रहना, खिलाते रहना, हुक्मों के नीचे दब-सी गई। वर्षो से हुक्म बजा लाने की आदत जो पड़ी है।
 सुबह जब ताजी हवा खाने जायें तो लौटते समय जरा दूध और ब्रेड लेते आईयेगा। ‘‘जरा क्यों? पूरी लायेंगे’’  ताजी हवा खाने बालों को गुस्सा पीना, अपने आप आ जाता है। हाँ आजकल आप सब्जी छांटते क्यों नही!सब्जी वाला बुड्ढा समझ कर आपको उल्लू बना देता है। वो तो सब्जी वाला है, तू तो मेरा वाला होकर भी मुझे उल्लू समझता है, पर तुझे उल्लू का पट्ठा नहीं कहूँगा’’
 खाना मेज पर रखा है, खा लीजियेगा, ‘‘मुझे आफिस के लिये देर हो रही है। खाऊँगा नहीं तो क्या करूँगा ?’’, उपवास थोड़े ही करूँगा ! बच्चों को स्टाॅप से ले भी आऊँगा। फोन और बिजली का बिल जमा कर दूंगा और पेंशन भी निकाल लाऊँगा’’। रिटायर्ड आदमी को या तो चुप रहना चाहिये या हाँ-हाँ करना चाहिये। क्योकि ज्यादा सुनने का तो किसी पर वक्त ही नही होता है। ऊर्जा बचती है अपना ही समय बचता है। दो काम अपनी तरफ से कर देंगे तो हर्ज ही क्या है?
 वाह ! बाबू जी, रिटायर हो गये पर बाबू ही बने रहोगे क्या? कलम घसीटने की आदत गई नही। फालतू में कागज गूदते रहते हो जे नहीं बच्चों का गृहकार्य करा दें। ‘‘कविता का घोर अपमान’’ किन्तु रिटायर्ड आदमी को गुस्सा तो आना ही नहीं चाहिये और चिल्लाने की ताकत होती नहीं, आराम करने की उम्र है, अनायास ही कविता पूरी हो गई और मन के कागज पर लिखा गई-

 सरकार दयालु है 
सचमुच सरकार बड़ी दयालु है ।
काम तो कोई और करवाता है,
किन्तु पेंशन सरकार देती है।।
 चलो बच्चो,गृहकार्य अधूरा है, हम पूरा करेंगे। दिन भर में पहली बार रिटायर्ड आदमी ने मुँह खोला।
सुधा चौधरी 

Thursday, 26 September 2024

अहंकार तो रावण का भी नहीं रहा

स्वाभिमान और अहंकार होते इंसानों को ही है, स्वाभिमान,आत्म सम्मान की सुंदर भावना से  ओत - प्रोत होता है जो कभी भी दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश नहीं करता, परंतु अहंकार यह जताने की कोशिश करता है की विशेष गुण या विशेष उपलब्धि के कारण मैं औरों से श्रेष्ठ हूं याद रखिए आपके बताने से आप श्रेष्ठ नहीं हो जाते।कस्तूरी को अपनी सुगंध फैलाने  कहीं नहीं जाना पड़ता सबको स्वतः ज्ञान में आ जाता है कि यह सुगंध हिरण की वजह से है। स्वाभिमान को सदैव बनाए रखना चाहिए क्योंकि मेरे स्वाभिमानी होने से कोई दूसरा नकारात्मक तरीके से प्रभावित नहीं होता किंतु अहंकारी या अभिमानी होने से जो 
'मैं 'का भाव मन में आता है वह हमें सामाजिकता से दूर कर देता है परिवर्तनशील जीवन में इस निकृष्ट या क्षुद्र अहंकार की,भावना को छोड़ देना चाहिए।🙏 नमस्कार,धन्यवाद
 सुधा चौधरी,
कल एक नए विचार के साथ पुनः आपके बीच🥰

Wednesday, 25 September 2024

ऐसी क्षमा,और कहां?

पूरे रामायण ग्रंथ का अवलोकन करने पर हम पाएंगे कि एक व्यक्ति  कैकई को छोड़कर सभी ने कितनी सहजता और खूबसूरती से क्षमा को धारण किया।
 पिता ने कहा 14 साल के लिए वन जाना है, सुबह राज तिलक होना था और आज यह आदेश, कोई तर्क नहीं। दशरथ ने कैकई को भी क्षमा कर दिया क्योंकि वन जाना मन में क्रोध लेकर या बिना क्षमा करे आसान/ संभव ही नहीं था। श्री राम का प्रश्न था, सहज में कब? मां सीता ने कौशल्या और सुमित्रा के साथ-साथ कैकई से भी कहा हम श्री राम के साथ जाएंगे यदि कैकई के प्रति जरा भी दुर्भाव होता तो वन जाते समय क्या तीनों माताओं के प्रति उनका एक जैसा भाव होता?शायद नहीं।सब क्षमा के भावों से भरे थे. लक्ष्मण ने कहा उर्मिला मैं भी साथ जा रहा हूं, कोई प्रतिकार नहीं, बैर भाव नहीं, गुस्सा नहीं अर्थात क्षमा ही क्षमा -
जाइये माता सीता और श्री राम को  आपकी बहुत जरूरत है। सीता को घनघोर जंगल में भेजा गया हिंसक पशुओं के बीच, नितांत अकेली पर कहा क्या?  सेनापति जाकर श्री राम से कहना, मुझे तो छोड़ दिया पर कभी धर्म को ना छोड़ दे, 🙏 श्री राम के प्रति करुणा, क्षमाऔर मैत्री। अग्नि में उतारा गया, कैसी परीक्षा ली गई?   सहर्ष तैयार तब भी श्री राम के प्रति कोई  राग द्वेष   नहीं। इससे ज्यादा क्षमा शायद ही हम कभी अपने जीवन में देख पायें या सुन पायें।यह थी रामायण। महाभारत में क्षमा ना कर पाने के कारण युद्ध, हिंसा और विनाश की लीला हुई। अंधे के पुत्र अंधे यह गलत भी नहीं था फिर भी सहन नहीं हुआ था। क्षमा ना कर पाने के कारण ही महाभारत हुई अपने जीवन में क्षमा को धारण कीजिए और जीवन को सुंदर दिशा दीजिए 🙏
धन्यवाद
सुधा चौधरी 
कल एक नए विचार के साथ फिर आपके साथ 🥰

Tuesday, 24 September 2024

कोई क्या कहेगा?

पहले हम आदतों को बनाते हैं फिर आदतें हमें बनाती हैँ ।आदत एक रस्सी की तरह होती है, हम प्रतिदिन उसमें एक बट देते हैं और आदत को मजबूत करते हैं।habit में से h हटा दें,abit रह जाएगा bit में से भी b हटा दे it रह जायेगा।बुरी आदतें हो या अच्छी हमारे परिचित, मित्र, रिश्तेदार, परिवारजन सब जानते हैं। एक बात सोचिए कोई क्या कहेगा? इस प्रश्न को अपने आप से  बार-बार पूछने से हम उस आदत से छुटकारा पा सकते हैं।
 मेरे,गुटखा से रंगे  दांतों को कोई देख ना ले एक बार भी यह  विचार मन में आ जाए या अपने दांतों को छुपाने के लिए ही तो  मैं मुंह बंद करके हंसता हूं 🥺या सामने वाला मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? सामने नहीं तो पीठ पीछे कुछ ना कुछ कहेगा, अवश्य। सिगरेट की डिब्बी पर बने कैंसर के पेशेंट के चित्र को बार-बार देखने से शायद कभी हमें उस सिगरेट से घृणा हो जाए, शराब ने किस तरह एक परिवार को बर्बाद किया है लत के अंजाम से इस तरह की बर्बादी को देखकर भी हम लत छोड़ने का प्रयास कर सकते हैं। गलत आदत को छोड़ते ही हमारे आत्मविश्वास के स्तर को एक ऊंचाई मिलती है। सुबह-सुबह जिस तरह हम अपने मुंह से आने वाली दुर्गंध से छुटकारा पाना चाहते हैं, उपाय करते हैं ठीक उसी प्रकार हमें बुरी आदतों से छुटकारा पाने का उपाय करना चाहिए👍 शुभ प्रभात मित्रों,
सुधा चौधरी🙏 कल फिर एक नए विचार के साथ, धन्यवाद

Monday, 23 September 2024

घड़ी चलती रहती है, मंजिल पर नहीं पहुंचती, पर हमें चलने की प्रेरणा देती है मंजिल पर पहुंचने के लिए👍

समय और अनुशासन को यदि परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं कि एक निश्चित समय अवधि में काम का पूर्ण होना भी अनुशासन है। एक घंटा कभी 60 मिनट से ज्यादा का नहीं हो सकता,मिनट कभी 60 सेकंड से ज्यादा का नहीं हो सकता। तो क्यों ना हम समय से ही समय का मूल्य करना सीखें।जैसे सही समय पर होने वाली बारिश फसलों के लिए वरदान है उसी प्रकार हमारे जीवन में भी समय का प्रबंधन बहुत आवश्यक है कहते समय की साथ चलो, समय का मूल्य करो, सही समय पर सही कम करो।
 जो समय को बर्बाद कर देता है समय उसे बर्बाद कर देता है एक मिली सेकंड या माइक्रो सेकंड को बचाना भी एक आर्ट है, किसी धावक से उस दर्द को पूछिए जो एक सेकंड के हजारवे हिस्से में पीछे रहकर रेस हार जाता है या डॉक्टर के एक सेकेंड लेट हो जाने पर 
 मरीज की मृत्यु हो जाती है इसलिए समय अमूल्य है।पूरी संपदा को देकर भी एक पल  लौटाया नहीं जा सकता। कल सही समय पर पुनः एक नए विचार के साथ 
धन्यवाद🙏सुधा चौधरी (जैन )

Sunday, 22 September 2024

सफलता एक यात्रा है,,मंजिल नहीं

एक लक्ष्य फिर उसे प्राप्त करने का जुनून और सही दिशा में किए जाने वाला पुरुषार्थ लक्ष्य तक पहुंचा देता है।
 सफलता प्राप्त करने के लिए हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होता है, दूसरों ने जिस राह को अपनाया है -हो सकता है उसके लिए वह रास्ता ठीक हो पर अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हमें,किस रास्ते पर चलना है, वह हमारी योग्यता,हमारा परिश्रम, हमारे संसाधनों की उपलब्धता और इन सबसे ऊपर --
बाधाओ से डर कर हिम्मत न हारने का जज्बा यही सब हमें सफलता की शत- प्रतिशत गारंटी देते हैं लक्ष्य प्राप्ति के बाद नया लक्ष्य बनाएं और पुनः एक नई यात्रा की शुरुआत करें।ठहर जाने का नाम जीवन नहीं। सांस भी ठहर जाए तो जीवन समाप्त हो जाता है, पानी ठहर जाए तो सड़ जाता है 
धन्यवाद 🙏अपनी राय जरूर प्रेषित करें🥰

Friday, 20 September 2024

"घर /मकान"

तुमने मकाँ,बनाया था हमने घर बना दिया, दरवाजा सूना-सूना था तोरण सजा दिया।
 तुमने रखा था चित्र मां का,  उदास कोने में, हमने दिया जला के मंदिर बना दिया।
 घर टूट जाएगा,आया यह मौका भी कई बार, खुद टूट गई "सुधा "पर घर को बचा लिया।
 चिड़िया की तरह एक दिन उड़ जायेंगे छोड़कर, जिंदगी से शिकायतों को गले से लगा लिया।
 अपनी हजार खामियां हम देख ना सके,
 तुम्हारी जरा सी बात का बतंगड़ बना दिया।
 क्या मिल गया दुख के दिल को तुम्हारे? बस आज से शब्दों को मरहम बना लिया लिया।🥰