पिता ने कहा 14 साल के लिए वन जाना है, सुबह राज तिलक होना था और आज यह आदेश, कोई तर्क नहीं। दशरथ ने कैकई को भी क्षमा कर दिया क्योंकि वन जाना मन में क्रोध लेकर या बिना क्षमा करे आसान/ संभव ही नहीं था। श्री राम का प्रश्न था, सहज में कब? मां सीता ने कौशल्या और सुमित्रा के साथ-साथ कैकई से भी कहा हम श्री राम के साथ जाएंगे यदि कैकई के प्रति जरा भी दुर्भाव होता तो वन जाते समय क्या तीनों माताओं के प्रति उनका एक जैसा भाव होता?शायद नहीं।सब क्षमा के भावों से भरे थे. लक्ष्मण ने कहा उर्मिला मैं भी साथ जा रहा हूं, कोई प्रतिकार नहीं, बैर भाव नहीं, गुस्सा नहीं अर्थात क्षमा ही क्षमा -
जाइये माता सीता और श्री राम को आपकी बहुत जरूरत है। सीता को घनघोर जंगल में भेजा गया हिंसक पशुओं के बीच, नितांत अकेली पर कहा क्या? सेनापति जाकर श्री राम से कहना, मुझे तो छोड़ दिया पर कभी धर्म को ना छोड़ दे, 🙏 श्री राम के प्रति करुणा, क्षमाऔर मैत्री। अग्नि में उतारा गया, कैसी परीक्षा ली गई? सहर्ष तैयार तब भी श्री राम के प्रति कोई राग द्वेष नहीं। इससे ज्यादा क्षमा शायद ही हम कभी अपने जीवन में देख पायें या सुन पायें।यह थी रामायण। महाभारत में क्षमा ना कर पाने के कारण युद्ध, हिंसा और विनाश की लीला हुई। अंधे के पुत्र अंधे यह गलत भी नहीं था फिर भी सहन नहीं हुआ था। क्षमा ना कर पाने के कारण ही महाभारत हुई अपने जीवन में क्षमा को धारण कीजिए और जीवन को सुंदर दिशा दीजिए 🙏
धन्यवाद
सुधा चौधरी
कल एक नए विचार के साथ फिर आपके साथ 🥰
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