Saturday, 28 September 2024

मुखौटा ✍️

जब हम मन में कुछ सोचते हैं लेकिन चेहरे के expression या भाव मन के विचारों को प्रकट नहीं होने देते कुछ और ही दिखाते हैं इसी का नाम मुखौटा है।वास्तव में यदि हम कुछ भी किसी के भी बारे में क्या सोच रहे हैं?अच्छा या बुरा उस भाव या विचार को चेहरे पर व्यक्त  नहीं होने देना यही तो मुखौटा है। मुखोटे अनेकों प्रकार के होते हैं जैसे, मां बच्चे को डांटते समय चेहरे को गुस्से से भर लेती है पर उसके अंतर में बच्चों के प्रति वात्सल्य ही रहता है,दूसरा हम किसी के प्रति बहुत अच्छे विचार नहीं रखते या उसे पसंद नहीं करते तब भी एक ऐसा face expression बना लेते हैं 'सुंदर,'की कोई मन के भावों को भांप नहीं सकता। लोक व्यवहार में यह ठीक हो सकता है किंतु आध्यात्म की दृष्टि से यह बिल्कुल ठीक नहीं, मित्रो रोज हम स्वयं का विश्लेषण करें तो रोजमर्रा के जीवन में मित्रों के सामने अलग,घर के नौकरों के सामनेअलग,रिश्तेदारों और परिवार जनों सामने अलग। यह अलग-अलग दिखाई देना, ही तो मुखोटे ओढ़ने जैसा है वास्तव में जैसे हम अंदर में है वैसे ही सरल और सहज बाहर में दिखे तभी हम इन मुखौटों से मुक्त हो सकते हैं। कभी-कभी इन मुखौटों को लगाए रखना जरूरी भी होता है,यदि मन के विचार शब्दों में और शब्दों का क्रियान्वयन शरीर से हो जाए तो यह संसार युद्ध का मैदान बन जाएगा। मन वचन और काय की एकरूपता का नाम ही मुखौटों से रहित जीवन है। 
सुधा चौधरी(जैन) 
कल फिर एक नए विचार के साथ धन्यवाद🙏✍️

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